एक संदेश विश्व के मजदूरों के नाम

दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ भी नहीं है, सिवाय अपनी जंजीरों के
           

कार्ल मार्क्स का यह कथन बरबस ही ज़हन में उभर आया क्योंकि 5 मई को इस महान जर्मन विचारक की जयंती है, जो मजदूरों को मालिकों के बराबर देखना चाहता था। संयोग ही है कि चंद रोज पहले 1 मई को मजदूर दिवस भी मनाया गया। मजदूर दिवस के कुछ ही हफ्तों पहले हम सभी ने भागते, तड़पते, हाँफते, भूख और लाचारी से सड़कों पर मरते मजदूर देखे। ऐसे समय में यह कथन प्रासंगिक जान पड़ता है। मजदूरों को एक होना ही होगा अगर इज्जत की जिंदगी चाहते है तो। मजदूर दिवस  प्रतिवर्ष 1 मई को मनाया जाता है, इस दिन हम सब मिलकर गरीब मजदूरों के लिए रोना रोते हैं। इतने वर्षों से हम इस दिन को इसलिए मनाते आ रहे है ताकि गरीब मजदूरों की दशा में सुधार हो सके, अफसोस ऐसा न हो सका। इस दिन सभी लम्बी-चौड़ी बातें और भाषणबाजी करते हैं,  मजदूरों के हक़ में तमाम सपने गढ़े जाते हैं। लेकिन यह दुःखद है कि रात होते-होते इन बातों और भाषणों को संदूक में संभालकर रख देते हैं, ताकि इन उच्च बचनों का अगले साल फिर से प्रयोग किया जा सके। कहीं ऐसा न हों कि इन भाषणों में से कोई एक भी अगले साल तक बासी हो जाये।          

ये मजदूर आजादी के 75 वर्षों के बाद भी मजबूर ही है। देखा जाए तो सबसे बुरे हालात असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के हैं, क्योंकि न ये अपने हक़ की आवाज उठा सकने में सक्षम हैं, न ही असंगठित होने के कारण इनकी बात को महत्व दिया जाता है। खराब स्थिति के मामले में दूसरे पायदान पर कृषि क्षेत्र के मजदूर हैं, हालाँकि मनरेगा, न्यूनतम मजदूरी दर का निर्धारण जैसी चंद योजनाएं लाकर इनकी स्थिति में कुछ सुधार लाने का प्रयत्न किया गया, किंतु ये प्रयास नाकाफी रहे और गाँव से इनके पलायन को रोका नहीं जा सका। ये अपने सीधे सपाट देहात से पलायन कर बड़े और कुटिल शहरों की ओर जाते रहे। ये जीवन जीने की जद्दोजहद में चले तो गए पर वहां जाने के बाद भी इस काबिल नहीं हो सके कि इनका परिवार मानवीय गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। इसका ताज़ा उदाहरण कोरोना महामारी से उत्पन्न लाकडाउन नाम का वह तूफान है जिसने एक झटके में इनके आशियां को उजाड़ दिया। अब यह घोंसला विहीन पक्षी की मानिंद फड़फड़ाने लगे और अपना आसरा खोजने लगे, मौसम बदलने के साथ ही इन प्रवासी पक्षियों को अपना वतन याद आने लगा। आएगा भी क्यों नहीं अपना वतन अपनी मिट्टी सभी को प्यारी होती है, खासकर दुःख-सुख के समय मे तो कुछ ज़्यादा ही याद आती है। इस वैश्विक महामारी से उपजे हालात नें मजदूरों के लिए की जाने वाली चिंताओं की पोल खोल कर रख दिया। पूरे देश ने देखा कि सरकारें इन मजदूरों का कितना ख़याल रखती हैं।यह वो जमात है जिसके कंधे पर भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने का बोझ है। जिनके कारण ही अर्थव्यवस्था पटरी पर चलती है, लेकिन अफसोस इससे इनकी गृहस्थी नहीं चलती।यह अत्यंत पीड़ादायी है कि जिनके ऊपर देश का भार है उन्हें देश पर भार बताया जाता हैं। यह कहना भी सही नहीं है कि विगत वर्षों में इनकी स्थिति को सुधारने के लिए काम नहीं हुए, हुए है लेकिन इनका असर उतना ही हुआ है जितना असर जेठ की तपती दोपहरी में किसी रेगिस्तान के ऊपर से कोई बादल जल गिराता हुआ चला जा रहा है।           

अगर हम संगठित क्षेत्र के मजदूरों की बात करते हैं तो पाएंगे कि उनकी स्थिति असंगठित क्षेत्र के मजदूरों से कुछ बेहतर है। सरकारों ने इनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए कई प्रकार की सहूलियतें दी हैं, जिससे उनका जीवन चल तो रहा है लेकिन अगर जीवन को दौड़ाने की कोशिश करने लगते हैं तो उनके घर की अर्थव्यवस्था हाँफने लगती है। सार्वजनिक क्षेत्र के मजदूरों(सरकारी कर्मियों) का स्तर ऊपर उठाने के लिए ही सम्मानजनक वेतन देना, गारन्टीड पेंशन योजना लागू करना, महंगाई बढ़ने के सापेक्ष उन्हें महँगाई भत्ता देना जिससे महंगाई का उनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े इसके साथ ही विभिन्न सेवाओं के लिए विभिन्न प्रकार के भत्तों का प्रावधान किया गया जिनसे उनके जीवन स्तर में सुधार आये और वह मानव गरिमा के साथ अपना और अपने परिवार का जीवन निर्वाह कर सकें। यह भत्ते, पेंशन और  सम्मानजनक वेतन सिर्फ इसलिए ही नहीं दिए जाते की उनके जीवन-स्तर में सुधार हो बल्कि इसलिए भी की उनकी क्रय शक्ति बढ़े जिसका सकारात्मक असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और देश मे खुशहाली  और समृद्धि बढ़ेगी।           

विगत कुछ वर्षों से स्थितियों में लगातार परिवर्तन होता जा रहाहै। मजदूरों को शोषण का जरिया बनाया जा रहा है, चाहे वह संगठित क्षेत्र(सार्वजनिक क्षेत्र) का मजदूर हो या असंगठित क्षेत्र का। फर्क केवल शोषण की मात्रा का है कहीं कम शोषण है तो कहीं ज़्यादा। असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों का शोषण बड़े पैमाने पर और अधिक मात्रा में होता है और अर्से से होता आ रहा है, वहीं संगठित क्षेत्र के मजदूरों का थोड़ा कम है, लेकिन शोषण होता जरूर है। संगठित क्षेत्र के मजदूरों का शोषण कम अवश्य है परंतु लगातार उनके शोषण के द्वार खोले जा रहे हैं। जबकि यह किसी से नहीं छुपा कि देश के विकास में इनका क्या योगदान होता है। सार्वजिक क्षेत्र के कर्मियों की बात करें तो विगत एक दशक से उनपर भारी शोषण के दरवाजे खोल दिये गए हैं। सबसे पहले उनके लिए पुरानी गारन्टीड पेंशन योजना समाप्त की गयी, कभी वेतन आयोगों के माध्यम से वेतन में नाम-मात्र की बढ़ोतरी की गयी, महंगाई भत्ते का महंगाई सूचकांक के अनुरूप न बढ़ाया जाना, विभिन्न भत्तों का समाप्त कर दिया जाना, तमाम सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण कर देना, तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को सरकारी सहायता रोक देना, मजदूरों के शोषण के नए-नए तरीके हैं। सरकारें यह संदेश देती हैं कि मजदूरों अगर तुम भी अच्छा जीवन जियोगे तो हमारा क्या होगा।              

आज आवश्यकता है दृढ़ इच्छाशक्ति की जिससे ठोस नीतियों के निर्माण के साथ-साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन हो सके, जिससे मजदूरों का शोषण रुके। उनके अधिकारों को मुलायम चारा समझकर खाने की प्रवृत्ति पर लगाम लग सके, उनका जीवन स्तर मानव गरिमा के अनुरूप हो सके। अगर देश की उन्नति का स्वप्न देखा जाएगा तो मजदूरों की स्थित के विषय मे पहले सोंचना होगा, क्योंकि देश का निर्माण उसके नागरिकों से होता है,जैसे नागरिक होंगे वैसा ही देश होगा। आवश्यकता है ऐसी कारगर रणनीति बनाने की जिसमे मजदूरों के अधिकारों का सरंक्षण हो सके, साथ ही संविधान में उल्लिखित लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी आकार लेती रहे। उन्हें मजबूरी में कोई काम न करना पड़े बल्कि उनकी योग्यतानुसार काम मिलता रहे, प्रत्येक व्यक्ति के काम को महत्व दिया जाए। छोटे से छोटे काम पर लगे मजदूर का सम्मान सुनिश्चित हो, न्यूनतम वेतन का निर्धारण ऐसा हो कि वह अमानवीय जीवन जीने पर मजबूर न हो, शिक्षा और स्वास्थ्य पाने के लिए मजबूर न हो,  ऐसी दशाओं में वह जीवन निर्वाह के लिए मजबूर न हो जिनको देखकर कहा जाए कि इनकी जिंदगी से बेहतर तो जानवरों की जिंदगी हैं, शोषण के खिलाफ कठोर विधान बनाकर उनका कड़ाई से पालन कराया जाए। जिससे उनका जीवन भी सामान्य गति से चले और उन्हें भी अपने होने पर गर्व हो सके। वह कह सकें कि मैं मजदूर हूँ लेकिन मजबूर नहीं तब मजदूर दिवस मनाने का अर्थ निकलेगा।

लेखक- रजत 'प्रहरी'

प्रदेश संयुक्त मंत्री, अटेवा 

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