तुम पूछती हो ना
कि मैं क्या चाहता हूँ
तो सुनो मेरे महबूब!
मैं तुम्हारी मांग का सिंदूर होना चाहता हूँ।
मैं किसी हीर का रांझा नहीं
ना शिरी का फरहाद होना चाहता हूँ
मैं एक बेमिसाल मोहब्बत का सम्पूर्ण उपन्यास होना चाहता हूँ
हां, मैं तुम्हारे मांग का सिंदूर होना चाहता हूँ।
मुझे ना किसी शोहरत की चिंता
ना कोई कुबेर चाहता हूँ
जो तुम्हारे सोलह श्रृंगार को पूर्णता प्रदान करे वो एक चुटकी भर से बनी वो लकीर होना चाहता हूँ
सुनो प्रिये, मैं तुम्हारी मांग का सिंदूर होना चाहता हूँ।
ना दुनिया को जीतने की ख्वाहिश
ना अलौकिकता की कोई जागीर चाहता हूँ
'मैं' और 'तुम' से आगे निकलकर 'हम' होने की मुकम्मल तस्वीर होना चाहता हूँ
हां, मेरी साथी मैं तुम्हारी मांग का सिंदूर होना चाहता हूँ।
ना दुनिया की भीड़ में प्रथम आने की लालसा
ना अपनों से हार-जीत की कोई जिद होना चाहता हूँ
मैं तो हमारी दुनिया में इक 'पीहू' सी कोहिनूर चाहता हूँ
हां मैं तुम्हारी मांग का सिंदूर होना चाहता हूँ।
- सुशील कुमार
❤️❤️❤️❤️❤️
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