Labour Day: साहब! भीख मांगल मंजूर बा,अब कबो गांव ना छोड़ब...खौफ-बेबसी और 'शहर' से नफरत का साल




बोलना ही होगा (bolna hi hoga) स्पेशल: 
केस 1.
फरीदाबाद से इटौंजा जा रहे शुभम सिंह (30)  आलमबाग में मिले। उन्होंने बताया कि 8 दिन से पैदल सफर तय कर लखनऊ पहुंचे हैं। रोजगार पूछने पर बताया कि दैनिक मजदूरी का काम करते हैं। काम मिल नहीं रहा, पैसे खत्म हो गए थे। कुछ बकाया था ठेकेदार के पास तो उसने देने से मना कर दिया। मकान का किराया नहीं था। किराए और कोरोना के खौफ से मकान मालिक ने भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब आप बताएं, का करें साहब! गांव ना जइबे त का करीत उहाँ.... लॉकडाउन के बाद फिर से फरीदाबाद जाने के सवाल पर शुभम बिफर गए। बोले- साहब! कसम खात हई, अगर जिंदा बची गएन, त अब कब्बो आप गांव ना छोरिबे.. गांव मा ना कवनो रोजगार मिली त भीख मांग लेब..लेकिन कान पकरित है, अब शहर ना जइबे कब्बो...

केस 2.
फरीदाबाद से सीतापुर के लिए निकले अरविंद कुमार शुक्ला (36) कहते हैं। भइया, पेट की भूख और मजबूरी सब करावत है.. लेकिन, एक बात समझ में आ गईल कि गांव के बराबरी शहर कब्बो ना करी पाई.. कम से कम गांव वाले विपत मा भगावत त ना हन.. दु रोटी कम खाब, लेकिन अब दुबारा शहर ना जाब.. गांवें मा रोजिगार करब। मनरेगा चाहे जवन काम मिली करब... लेकिन जिंदगी में अब कमाए खातिर त शहर नाही जाब..

केस 3.
पवन सिंह (28) बताते हैं कि एक हफ्ता से ठीक से कुछ खा नहीं पाए हैं, बस चल रहे हैं। मां-बाप तो बौखला गए हैं। उनकी तकलीफ को सिर्फ हम समझ सकते हैं। थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी है। अब वही करेंगे। मुसीबत में अपनी जमीन ही काम आती है। सिर्फ वही आपको आसरा दे सकती है। इस लॉकडाउन ने तो इतना सबक दे ही दिया है। बस भगवान से गुजारिश है कि सब सही हो जाए। गांव में ही अब काम करेंगे। 
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ये तीन व्यक्ति तो मजदूरों का दर्द बयां करने की सिर्फ बानगी भर हैं। ऐसे लाखों मजदूर हैं, जो अब 'शहर' से तौबा कर रहे हैं। एक खौफ ये भी है कि पता नहीं कब कौन बीमारी आये और ले जाए। ऐसे में परिवार के साथ रहना ही अब सबसे बेहतर है। गांवों में मनरेगा, खेती और ईंट भट्ठा आदि के उद्योगों ने थोड़ी बहुत राहत दी है। वो भी ऐसे वक्त में, जब रोजगार के लाले पड़े हों। ऐसे में गांव के प्रति एक आस बंधना लाजिमी ही है। एक बात तो तय है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद बहुत से ऐसे मजदूर होंगे जो अब शायद ही गांव छोड़ शहर का रुख करें। 
गांव के कुछ युवा जो गोवा, मुंबई, दिल्ली, गुजरात में नौकरी करने गए हैं वहाँ फंस गए हैं। उनसे मैंने खुद फोन पर बात की, तो उनका साफ कहना है कि गांव में होते तो इस तरह दरबदर ना होते... एक तो रुंआसा हो उठा और बोला- भैया, गांवें में खाये खातिर केतना हमनी के नखरा कईल जाला। माई बाप त पीछे-पीछे घूमे लन कि चल खा ले.. आज ई दिन आ गईल बा कि 24 घण्टा में कहीं से 2 रोटी मिल जाए त बहुत बड़ बात हो जात बा.. ओहू में जे खाए के देत बा, उ खाना कम फ़ोटो ज्यादा खींचत हवन सन। मन त करेला की ओकरिन सब से कहीं के चल सारे हमरे गांवें... तोके देखाईं की हमनी के केहू के कइसे मदद कईल जाला.. तोहनी मार फ़ोटो खींचत बाड़ा सन..उसने कहा कि भैया, सिर्फ इसलिए गांव से यहां आए थे कि थोड़ा कमा लेंगे तो शायद स्तिथि सुधर जाए.. लेकिन, अब समझ आ गईल कि एकर कवनो भरोसा ना ह, कब कवन बीमारी आई अउर सब चौपट कर देई। अब गांवें आईब त खेती-बारी सम्भालब.. जेतना मेहनत यहां करल जाला, ओतना अपने खेतवे में कर लिहल जाई त भूखे मरले क नौबत ना आई.....
मुंबई में फंसे एक साथी ने कहा- यार, इहे न फरक बा गांव आ शहर में। माई-बाप त फोन करके हाल चाल लेते बाड़न, गऊंवां के 'फलाने' चाचा और भैया भी फोन कईले रहुएं कि हमनी के ठीक बाड़ीं जा कि ना... एगो इहाँ के लोग बा, पड़ोस में का हो रहल बा, केहू से कवनो मतलबे नईखे.. भाई, कवनो जुगाड़ होखे त गांवें आवे के व्यवस्था कर यार... बस एक बार आ जाए दे.. गांवें में लेबरई करब, अधिया पर खेत बोइब लेकिन अब गांव ना छोड़ब...

नोट- नीचे बातचीत में सभी के नाम जानबूझकर नहीं दिए गए हैं। ये रियल बातचीत पर आधारित है। जिनकी।फ़ोटो और नाम हैं, उनसे परमिशन लेने के बाद ही पब्लिश किया गया है। 

- bolnahihoga.blogspot.com

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