बोलना ही होगा (bolna hi hoga) :
कोरोना वायरस से उपजा संकट कितना व्यापक और गम्भीर होगा इसका आकलन करना जल्दीबाज़ी होगा । लेकिन एक वायरस के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी के चपेट में आ गया है इससे बिल्कुल नकारा नही जा सकता। कोरोना ने भारत जैसे विकासशील देशो के लिए गऱीबी ,बेरोजगारी ,भुखमरी,और खत्म होती अर्थव्यवस्था के चिंता को और प्रगाढ़ कर दिया है ।
लेकिन ये भी सत्य है कि सारी समस्याओं का जड़ कोरोना के माथे लगा देना ये भी उचित नही होगा ।
आकड़ो पर नजऱ डाले तो पता चलता है की भारत जैसे घनत्व वाले देश मे बेरोजगारी एक बड़ी समस्या पहले से ही थी और नोटबंदी के साथ ही हमने मंदी व बेरोजगारी को भारत मे खुला आमंत्रण दे दिया ।
भारत आज विश्व मे युवा शक्ति के रूप में शुमार हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि प्रतिदिन बढ़ती बेरोजगारी के कारण सबसे अधिक आत्महत्याओं का कलंक भी हमारे माथे पर लगा हुआ है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्रतिदिन औसतन 38 युवा खुद को काल के गाल में झोंक रहे हैं ।अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, भारत सरकार और विभिन्न एजेंसियों के ताजा सर्वेक्षण इस ओर इशारा करते हैं कि देश में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ा है। जिन युवाओं के दम पर हम भविष्य की मजबूत इमारत की आस लगाए बैठे हैं उसकी नींव की हालत निराशाजनक है ।
NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018 में किसानों से ज्यादा बेरोजगारों ने आत्महत्या की है । साल 2018 में 12,936 लोगों ने बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। इसी साल किसान आत्महत्या के आंकड़ों को देखें तो 10,349 किसानों ने खुदकुशी की थी ।
लेकिम इन दोनों आत्महत्यों को हम अलग नही रख सकते क्योंकि सम्भवतः दोनो की समस्या का जड़ रोजगार और अर्थ से जुड़ा हुआ है ।
हम सभी जिस सामाजिक परिवेश में रहते है वहाँ आदमी का आंकलन उसके व्यवहार, चरित्र, गुण से नहीं बल्कि उसका एक मात्र मानक मौजूदा समय मे सरकारी नौकरी है ,वो सरकारी नौकरी कैसी भी हो । लेकिन दूसरी ओर सच्चाई ये है कि भारत सरकार ने रेलवे, LIC , एयर इंडिया,बीपीसीएल,सेल सहित 29 पब्लिक सेक्टर के कंपनियों को निजीकरण करने का निर्णय ले चुकी है । एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत मे क़रीब 53.4 करोड़ काम करने वाले लोग है उनमें से करीब 39.8 करोड़ लोगों के पास उनकी योग्यता अनुसार न तो काम मिलेगा और न ही नौकरी । इसे वाणिज्य के टर्म में अंडर इंप्लॉयमेंट कहते है ।
अब अगर परिवार या समाज के लोग छात्रों या प्रतिभागियों से सरकारी नौकरी पर सवाल करते हैं तो उससे पहले उनको अपनी सरकार से यह सवाल पूछना चाहिए कि आख़िर सरकारी नौकरी को खत्म क्यों किया जा रहा है ।
अब ADR के रिपोर्ट पर ध्यान दीजिए इसके मुताबिक 542 सांसदों में से 233 यानि 43 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित हैं। हलफनामों के हिसाब से 159 यानि 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है । इन आंकड़ों से ये स्पष्ट होता है कि आज के सामाजिक ढांचे में चाल, चरित्र , कुशल व्यवहार का होने आपके व्यक्तित्व का वर्णन नही करता । अगर करता तो ये लोग संसद में न पहुँचते । एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक ही संसद में बैठने वाले 88% सांसद करोड़पति हैं । वही बीएसएनल के लगभग 90000 कर्मचारियों को VRS लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इन आंकड़ों से एक बात तो स्पष्ट होता है कि सरकार रोजगार नहीं दे पा रही है और जिनके पास रोजगार है उनको वेतन देने की स्थिति में नहीं है । लेकिन यह सभी स्थितियां कोरोना काल से पहली की है इसके बाद की स्थिति कितनी भयावह हो गई कुछ कहा नहीं जा सकता ।
आईएलओ ने जो अनुमान लगाया था उसके अनुसार वर्ष 2018 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.86 करोड़ रहने का अनुमान था और ये संख्या के अगले साल यानी 2019 में 1.89 करोड़ तक बढ़ जाने का अनुमान लगाया गया था। इन्ही आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे ज्यादा बेरोजगारों का देश बन गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस समय देश की 11 फीसदी आबादी बेरोजगार है। ये वो लोग हैं जो काम करने लायक हैं, लेकिन उनके पास रोजगार नहीं है। इस प्रतिशत को अगर संख्या में देखें, तो पता चलता है कि देश के लगभग 12 करोड़ लोग बेराजगार हैं। इसके अलावा बीते साढ़े तीन साल में बेरोजगारी की दर में जबरदस्त इजाफा हुआ है। यह तो कहना है, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ की रिपोर्ट का ।
एनएसएसओ द्वारा किए जाने वाले पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर 1972-73 के बाद सबसे ऊंची है । सरकार के ही आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्र में रोजगार की चाहत रखने वाले 7.8 फीसदी युवा बेरोजगार हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में यह आंकड़ा 5.3 फीसदी है।
महिलाओं के मोर्चे पर तो हालत और खराब है। रिपोर्ट के अनुसार बीते चार साल में महिलाओं की बेरोजगारी दर 8.7 तक पहुंच गई है।
भारत जैसे जनसंख्या वाले देश में सबको रोजगार दे पाना एक चुनौती है लेकिन हमको उसके विकल्प पर कार्य करने होंगे और उससे भी बड़ी चुनौती सबको सरकारी नौकरी की मांग की पूर्ति कर पाना ।
केंद्रीय श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार हर रोज 550 नौकरियां कम हो रही हैं और स्वरोजगार के मौके घटे हैं।
NSSO के आंकड़े पर ध्यान दीजिएगा तो पता चलेगा कि देश में कुल 12 करोड़ों रजिस्टर्ड मनरेगा के श्रमिक हैं लेकिन सरकार मात्र 70 लाख श्रमिकों को 100 दिन के रोजगार देने में सक्षम है ।
वास्तविकता यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही खराब थी सरकार का खजाना खाली था लेकिन करोना ने अर्थव्यवस्था को आईसीयू में ढकेल दिया है जिससे कि एक अलग तरह की चुनौती आने वाले समय में देखने को मिलेगी ।
देश में बेरोजगारी की दर कम किए बिना विकास का दावा करना कभी भी न्यायसंगत नहीं होगा।
बेरोजगारी दूर करने के दीर्घगामी उपाय के रूप में हमें जनसख्या वृद्धि पर अकुश लगाना पड़ेगा । तात्कालिक उपाय के रूप में निजी व्यवसायो को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन के साथ धन भी उपलब्ध कराना होगा , ताकि नौकरियो की तलाश कम हो सके।
गांवो में कुटीर उद्योग-धंधों को बढ़ावा देना होगा तथा समय पर कच्चा माल की उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा ।
किसानों के जरूरत व उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए उनके हाथों को मजबूत करना होगा इस बात पर ध्यान देना होगा कि उनका उत्पादन कैसे बढ़ाया जाए जिससे कि जीडीपी में उनका हिस्सेदारी बढ़ सकें । साथ ही साथ सरकार को उचित मूल्य पर तैयार माल , फसल खरीदने की गांरटी भी देनी होगा ।
कुल मिला कर सरकार को स्मार्ट सिटी या विलेज पर नहीं स्मार्ट सिटीजन पर काम करना चाहिए अगर यहाँ सफ़ल हुए सिटी और विलेज तो अपने आप स्मार्ट हो जाएगी ।
इन सभी आंकड़ों को बताने का उद्देश्य यह था कि हम सभी के लिए सरकारी नौकरी व रोजगार कितना महत्वपूर्ण है लेकिन यह हमारे बीच से गायब है । वास्तव में देश, देश का संविधान तब खतरे में आ जाएगा जब लोगों के पास रोजगार नहीं होगा, भुखमरी और गरीबी चरम पर होगी । मतलब साफ़ है चुनौतियों से मुंह फेर लेना दूसरी चुनौती को निमंत्रण देना है ।
मैं कोई अर्थशास्त्री तो नहीं लेकिन एक बेरोजगार छात्र के साथ वाणिज्य के छात्र होने के नाते आने वाली समस्याओं और चुनौतियों की तरफ समाज का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं । जिससे की मिलकर निपटा जा सके।
लेखक- शुभम मिश्र
छात्र (वाणिज्य विभाग) , लविवि
नोट- ये लेखक के निजी विचार हैं। bolnahihoga.blogspot.com इन दावों की पुष्टि नहीं करता है।
इनसे कुछ नहीं हो पाएगा
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