मिथक तोड़ता भोजपुरी सिनेमा




यूँ तो भारत में मनोरंजन की बात की जाए तो यहाँ बॉलीवुड(हिंदी सिनेमा) का अपना राज है. लेकिन उसकी प्रभुसत्ता को चुनौती के रूप में तमिल और भोजपुरी फ़िल्में कड़ी टक्कर दे रही हैं. इसका जीता जागता उदाहरण, तमिल फिल्मों को हिंदी संस्करण में बनाने का रिवाज सा चल गया है. अगर देखा जाए तो हिंदी फिल्मों के हिट होने का एक बेजोड़ तरीका है, तमिल फिल्मों का हिंदी रीमेक. लेकिन इन सबके बीच जो एक अलग एक लकीर खींचता हुआ दिख रहा है तो वह है भोजपुरी सिनेमा. अलग क्यूँ ? यह एक सवाल हो सकता है, लेकिन इसके कारण कई हैं. इन कारणों में सबसे बड़ा कारण है, बजट के अभाव में अच्छा मुनाफा. 20 करोड़ से भी ज्यादा भोजपुरी भाषियों के बीच मनोरंजन का एक अच्छा बाज़ार है. यही कारण है कि लाखों के बजट में बनने वाली फ़िल्में करोड़ों का बाजार करती हैं. इसका अंदाजा इस बात से सहज लगाया जा सकता है कि 2004 में आई मनोज तिवारी की फिल्म ‘ससुरा बड़ा पईसा वाला’ ने 6 करोड़ की कमाई की थी. जबकि यह फिल्म मात्र 27 लाख में बनी थी. हालांकि यह सच्चाई है कि भोजपुरी फिल्मों की अधिकतर कहानियां हिंदी फिल्मों से कॉपी की जाती हैं या यूँ कहें कि उनकी रीमेक बनाई जाती हैं. लेकिन, एक अलग लकीर खींचते हुए तब महसूस होता है जब इनकी फिल्मों के मुख्य किरदारों के टाइटल ‘पिछड़ी या दलित जातियों’ के होते हैं. जो कि वैश्विक पहचान कायम किये बॉलीवुड आज तक नही कर सका है. अपनी इन खामियों को लेकर हिंदी सिनेमा जरुर बुद्धिजीवियों की आलोचना का शिकार होता रहा है. लेकिन गिनी चुनी एकाध फिल्मों के अलावा ये ऐसा अब तक नहीं कर सके हैं जो भोजपुरी सिनेमा ने किया है. दूसरी तरफ जब हम नजर दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि हिंदी फिल्मों से हमारे गाँव गायब होते जा रहे हैं. लेकिन भोजपुरी फिल्मों का तो अस्तित्व ही गाँवों पर टिका है. भोजपुरी फिल्मों की सबसे बड़ी आलोचना उनके गानों के गंदे बोल को लेकर हो सकती है. लेकिन हिंदी सिनेमा भी इससे अछूता नही रहा है. अब तो हिंदी फिल्मों में कुछ ना कुछ ऐसे आपत्तिजनक सीन जरुर होते हैं जिन्हें हम अपने परिवार के साथ बैठकर नहीं देख सकते.

          अगर हम देखें तो हिंदी फिल्मों की हीरोइनें अपने जीरो फिगर को लेकर खूब लाईमलाईट बटोरती हैं या यूँ कहें कि उन्हें काम मिलने के कारणों में से ये होना जरुरी है. लेकिन, जैसे ही हमारी नजर भोजपुरी हीरोइनों की तरफ जाती है तो एक अलग ही तस्वीर निकलकर सामने आती है. जहाँ हीरोइनें अच्छी खासी सेहतमंद होतीं हैं. हीरो मल्टीटैलेंटेड होते हैं, जो अपने गानों को अपनी आवाज़ देते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि भोजपुरी फिल्मों के नायक मूलरूप से गायक ही होते हैं. जो जितना बड़ा गायक वो उतना बड़ा भोजपुरी सिनेमा का सुपरस्टार माना जाता है. सामजिक बुराइयों के प्रति आन्दोलन की तरह आवाज़ उठाता, भोजपुरी सिनेमा बिना हल्ला मचाये अपनी एक पहचान कायम करने की ओर लगातार अग्रसर है. हाल के वर्षों में भोजपुरी की लोकप्रियता में काफी इजाफा हुआ है और यही सबसे बड़ा कारण है कि इसके बाज़ार में भी काफी उछाल देखने को मिला है. कई फिल्मों व गानों ने तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक अपनी धमक दिखाई है.
                  500 करोड़ के बाज़ार वाले भोजपुरी सिनेमा ने बॉलीवुड की कई हस्तियों को अपने पाले में आने को मजबूर किया है. अमिताभ बच्चन, मिथुन, अजय देवगन,तब्बू सरीखी हस्तियाँ यहाँ अपनी किस्मत आजमा चुकी हैं. अब तक सिंगलस्क्रीन पर चलने वाली भोजपुरी फिल्में अगर मल्टीप्लेक्स में भी कब्जा करनें लगें तो इस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

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