बाराबंकी के हैदरगढ़ से आये रिक्शाचालक फूलचंद बताते हैं कि दिनभर में 200 से 250 कमाता हूँ और उसमे से 50 रुपया रोज मालिक को देना पड़ता है, खर्च बचाने के लिए रात रिक्शे पर ही बितानी पड़ती है. बीमार हो जाने की स्तिथि में कोई अन्य रोजगार का साधन ना होने के कारण घर में भुखमरी के हालात पैदा हो जाते हैं. आलमबाग के पास मजदुर मंडी में मजदूरों के बीच में खड़े मेवालाल उम्मीद भरी निगाहों से देखते हुए अपनी बारी आने पर लगभग बिफरते हुए बताते हैं कि गाँव में सुखा पड़ने और रोजगार के अभाव के कारण हम यहाँ पलायन को मजबूर हैं सरकारें हमारे लिए नही सिर्फ अपने लिए काम करती हैं और अपना जेब भरती हैं.
मेवालाल बताते हैं कि साहब मनरेगा की मजदूरी से इतना नही कमा पाते कि अपना और अपने परिवार के लिए दवा-दारू और बच्चों की पढाई का खर्च चल जाए.... और उस पर प्रधान ही आधा पैसा खा जाता है. टाइम पर काम नही मिलता. 100 दिन की कमाई पे 365 दिन का खर्च कैसे चले ? यहाँ रोज काम मिल जाता है ? के सवाल पर मजदूरों की भीड़ में से संत प्रसाद बताते हैं कि साहब यहाँ रोज सुबह आते हैं और काम के लिए मोलभाव होता है, अगर मालिक को भाव पट गया तो काम मिल जाता है, नही तो कभी कभी खाली भी रहना पड़ता है.
वैश्वीकरण के इस आधुनिक दौर में चीजें काफी चमक रही हैं, लेकिन एक चीज जो हम खोते जा रहे हैं वह है श्रमिकों के चेहरे की चमक. वही श्रमिक जो रोजगार के लिए पलायन को मजबूर हैं और बेबस भी. हालंकि 1 मई को पूरा विश्व जहाँ मजदुर दिवस मना रहा है और सरकारें मजदुर हित का दावा करते नही अघा रही हैं, वहीँ पर मजदूर अभावों की जद में और जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण अपने दिन जैसे तैसे काट रहे हैं. हमने जब श्रम और श्रमिकों के हालात जानने के लिए उनसे बातचीत का सिलसिला शुरू किया तो सच काफी भयावह रूप में निकलकर सामने आया. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहाँ जनता को सर्वशक्तिमान माना जाता है वहां सरकारों और जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण लोग भुखमरी के कगार पर जीने को बेबस होते जा रहे हैं.हम बात कर रहे हैं उन श्रमिकों की जो आजादी के आधे से ज्यादा सदी के बीत जाने के बाद भी उपेक्षा का शिकार हैं. आज एक ओर भवन निर्माण, सड़क निर्माण, छोटी-बड़ी प्राइवेट फैक्टरियों, मिलों और खदानों में बहुत बड़ी संख्या में लोग ठेके पर मजदूरी करने के लिए विवश हैं, तो वहीं दूसरी ओर, नगरों-महानगरों में दूसरों के घरों, गलियों, नालियों में दिहाड़ी पर काम करने को विवश हैं. सबसे बड़ा सवाल तब उठता है जब इन हादसों में मजदुर अपनी जान गंवा देते हैं और जिम्मेदार अधिकारी तथा नेतागण मुआवजों के नाम पर उनके घर जाकर अपनी रोटी सेंकते हैं. देखा जाए तो देश में मजदूरों का सवाल धीरे-धीरे परिदृश्य से बाहर होता चला गया.
अब चुनावों में भी मजदूरों के हितों की बात राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में नहीं होती है. अब तो संगठित क्षेत्रों में भी मजदूरों की स्थिति अच्छी नहीं रह गयी है. वैश्वीकरण के इस दौर में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के नाम पर मजदूरों के प्रश्न को अप्रासंगिक बना दिया गया है. ऐसी परिस्थिति में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के हितों की बात भला कौन करेगा?लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन के बाहर सफाई कर रहे निक्की से जब हमने बातचीत की और पूछा कि इस मजदूरी के पैसे से खर्च चल जाता है ? तो वो एकदम से शांत होकर इधर उधर देखते हुए कहता है, साहब !! जितनी मजदूरी यहाँ तय है अगर इमानदारी से उतनी पूरी मिल जाती तो जरुर चल जाता ..... लेकिन .... कुछ हिचकते हुए कहता है, लेकिन यहाँ पर हमारा ठेकेदार आधा पैसा काम दिलवाने के नाम पर ले लेता है. आज की महंगाई के दौर में 200-230 रूपये में कहाँ परिवार का खर्च चल पायेगा. बच्चों की पढ़ाई महंगी फ़ीस का हाल तो जानते ही हैं. इन सारी दिक्कतों के लिए ओवरटाइम करना पड़ता है और दुसरे जगह भी जाकर काम करता हूँ तब जाकर कहीं घर का खर्च जैसे तैसे चल पाता है.
उपरोक्त ये सभी श्रमिकों की कहानियां और शिकायते लगभग एक सी हैं. लेकिन इन दबे कुचलों की आवाज आखिर सुने भी तो कौन ? सरकारों की उदासीनता से इनके अन्दर खिन्न सी पैदा हो गयी है. यहाँ न तो उनके जीवन की न्यूनतम व्यवस्था होती है, न ही उनकी सुरक्षा निश्चित होती है. न ही उनकी मजदूरी इतनी होती है कि वे जीवन की बेहतर परिस्थितियों को खरीद सकें. यह श्रम या श्रमिक की स्वाभाविक स्थिति नहीं है, बल्कि यह विकास के पूंजीवादी ढांचे का स्वाभाविक लक्षण है. नगरों में पूंजी और बाजार का केंद्रण गांवों से पलायन को स्वाभविक रूप से जन्म देता है. पूंजीवाद के इस लक्षण से निबटे बिना ‘श्रमेव जयते’ की बात असंगत है. यहाँ सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक श्रमिक सिर्फ दूसरों के लिए सुविधाओं का उत्पादन करता रहे और खुद अभाव व अपमान झेलता रहे ?
(नोट-- न्यूज़टाइम्स मैग्जीन के 1 मई 2016 के अंक में प्रकाशित )
(नोट-- न्यूज़टाइम्स मैग्जीन के 1 मई 2016 के अंक में प्रकाशित )

बहुत ही अच्छी लेख , सराहनीय ।ऊपर वाले से दुआ है कि आप ऐसे ही और तरक्की कर।
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