किशोर न्याय (संशोधन) अधिनियम 2015 आखिर पारित हो ही गया,और यह एक और कानून
के रूप में हमारे समक्ष है । संसद से मंजूरी मिलने के बाद 16 से 18 साल के
किशोरों के जघन्य अपराध में संलिप्तता के बाद उन पर वयस्क अपराधियों के
समान सजा का प्रावधान किया गया है । लेकिन क्या इससे भविष्य में इस तरह की
घटनाओं और अपराधों की संख्या घटेगी ? यह एक यक्ष प्रश्न की तरह हमारे लिए
एक बड़ी चुनौती है । इतना तो तय है कि यह कानून मीडिया और जनता के दबाव की
उपज है । जो निर्भया काण्ड के बाद से ही चर्चा जोरों पर थी और आखिर 3 साल
बाद इसे मंजूरी मिल गयी ।'दबाव की उपज' वाला यह क़ानून कितना कारगर साबित
होगा, यह तो फिलहाल अभी भविष्य के अंधेरों में कैद है । जरुरत है समाज के
मनोविज्ञान को समझने की, उसकी जरूरतों और कमियों के परीक्षण की । किसी
समस्या का समाधान एक क़ानून ही है ? यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है , क्योंकि
हत्या की अधिकतम सजा फांसी होने के बावजूद क्या देश में हत्याएं होना बंद
हो गयीं ? बंद होना तो दूर इनमे थोड़ा सा अंकुश भी नही लगाया जा सका है ।
यहां समझने की आवश्यकता ये है की इन कारणों के पीछे कौन से कारक हैं । ये
बुराइयां आखिर पनपती क्यों हैं और इतना बड़ा रूप कैसे अख्तियार कर लेती हैं ।
ऐसी घटनाओं के पीछे उनका सामजिक परिवेश, शिक्षा का अभाव,मानसिक
स्तिथि,गरीबी,भूख आदि समस्याएं इनके भटकाव का सबसे बड़ा और प्राथमिक कारण है
। अमीरी गरीबी का फ़ासला, कम समय में दुनिया की आधुनिक भोग बिलासता पूर्ण
जीवन की हिलोरें मारती आकांक्षाएं इस अपराध का दूसरा बड़ा कारण है । इन बाल
अपराधों के पीछे इससे जुड़े रैकेट इन कार्यों को लालच देकर करवाते हैं । खुद
महिला एवम बाल विकास मंत्री मेनका गांधी इस बात को स्वीकार करती हैं, कि
बच्चों को इन अपराधों को करने के लिए उकसाने का कार्य किया जाता है । उनके
जेहन में भर दिया जाता है कि अपराध करने पर उम्र कम होने के कारण कम सजा
मिलेगी । अक्सर बड़े अपराधी इस प्रकार का प्रलोभन देकर , उन्हें अपनी ढाल
बनाकर अपराधों की अंजाम दिया जाता है ।
कानूनों की बढ़ती संख्या और उनकी जटिलता भी एक बड़ा नकारात्मक प्रभाव डालती है । अक्सर लोगों से गुस्से में सुनने को मिलता है की 'एक अपराध करो या 10 सजा वही मिलनी है' । इस प्रकार की सोच उसे एक बड़ा अपराध करने को प्रेरित करता है, और ये बाल अपराध को रोकने लिए एक बड़ी बाधा का कारण बन सकता है। जाहिर सी बात है ये समस्या अशिक्षित समाज में सबसे ज्यादा पाई जाती है,और इस प्रकार के बाल अपराधी भी । कानून की की जटिलता से न्याय मिलने में भी देरी होती है , जिसमे आरोपी की वास्तविक उम्र पता करने में ही दशकों लग जाते हैं । इसका सबसे बड़ा उदाहरण लखनऊ का आशियाना रेप काण्ड है । ऐसे बहुत से उदाहरण ढूंढने पर मिल जाएंगे ।
इस प्रकार की समस्याओं से निजात पाम के लिए कुछ कारगार उपाय करने होंगे, सामजिक चेतना बढ़ानी होगी। अनिवार्य शिक्षा को जन जन तक पहुंचाने के लिए गैर सरकारी संस्थानों की सहायता लेनी होगी । जो पैसा सरकार विज्ञापनों पर खर्च करती उन्ही पैसों से इन संस्थाओं में खर्च कर लाभ लेने को जरुरत है । सुधार गृहों में घर जैसा माहौल दिया जाए, वहां शिक्षा का प्रबन्ध सुचारू रुप से किया जाए ।पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जाए । ये जिम्मेदारी समाज को खुद अपने कन्धों पर लेनी होगी सिर्फ सरकार से उम्मीद लगाना श्रेयस्कर नही होगा । सिर्फ कैंडल मार्च लेकर प्रदर्शन में ही आगे आना सामजिक दायित्व नही है, इन सबकी बारी ही नही आये इसका प्रण लेना होगा । किसी भी समस्या का निराकरण , उसके कारणों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने में ही निकलेगा, ना कि क़ानून बना देने से । समस्या की शाखाओं को कुतरने का प्रयास करने से बेहतर उसकी मूल जड़ों पर प्रहार किया जाए ।
http://hindi.oneindia.com/ news/features/new-juvenile- justice-bill-controlled-rape- case-374360.html oneindia के पेज पर 6 जनवरी 2016 को प्रकाशित
कानूनों की बढ़ती संख्या और उनकी जटिलता भी एक बड़ा नकारात्मक प्रभाव डालती है । अक्सर लोगों से गुस्से में सुनने को मिलता है की 'एक अपराध करो या 10 सजा वही मिलनी है' । इस प्रकार की सोच उसे एक बड़ा अपराध करने को प्रेरित करता है, और ये बाल अपराध को रोकने लिए एक बड़ी बाधा का कारण बन सकता है। जाहिर सी बात है ये समस्या अशिक्षित समाज में सबसे ज्यादा पाई जाती है,और इस प्रकार के बाल अपराधी भी । कानून की की जटिलता से न्याय मिलने में भी देरी होती है , जिसमे आरोपी की वास्तविक उम्र पता करने में ही दशकों लग जाते हैं । इसका सबसे बड़ा उदाहरण लखनऊ का आशियाना रेप काण्ड है । ऐसे बहुत से उदाहरण ढूंढने पर मिल जाएंगे ।
इस प्रकार की समस्याओं से निजात पाम के लिए कुछ कारगार उपाय करने होंगे, सामजिक चेतना बढ़ानी होगी। अनिवार्य शिक्षा को जन जन तक पहुंचाने के लिए गैर सरकारी संस्थानों की सहायता लेनी होगी । जो पैसा सरकार विज्ञापनों पर खर्च करती उन्ही पैसों से इन संस्थाओं में खर्च कर लाभ लेने को जरुरत है । सुधार गृहों में घर जैसा माहौल दिया जाए, वहां शिक्षा का प्रबन्ध सुचारू रुप से किया जाए ।पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा पर जोर दिया जाए । ये जिम्मेदारी समाज को खुद अपने कन्धों पर लेनी होगी सिर्फ सरकार से उम्मीद लगाना श्रेयस्कर नही होगा । सिर्फ कैंडल मार्च लेकर प्रदर्शन में ही आगे आना सामजिक दायित्व नही है, इन सबकी बारी ही नही आये इसका प्रण लेना होगा । किसी भी समस्या का निराकरण , उसके कारणों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने में ही निकलेगा, ना कि क़ानून बना देने से । समस्या की शाखाओं को कुतरने का प्रयास करने से बेहतर उसकी मूल जड़ों पर प्रहार किया जाए ।
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