घर की आन और देश की शान है बेटियां,
फिर भी इस सभ्य समाज में ,
क्यों अभिशाप है बेटियां...
समाज के पथ प्रदर्शन में आगे,
हर दुःख चुपचाप सहने वाली,
इस मनुवादी समाज में,
क्यों पैरों के नीचे की छाप है बेटियां...
हे नीच सोच वालों !!! बदल के तो देखो,
कभी दुर्गा , कभी लक्ष्मी तो,
कभी कल्पना और सुनीता की अवतार है बेटियां...
जिस माँ ने तुम्हे जनम दिया,
पाल पोस के बड़ा किया ,
अपनी मर्दानगी पे नाज़ करने वालों,
अबला बता उनका शोषण करने वालों,
हे पापियों !! उसी माँ की अवतार है बेटियां...
जिसके गर्भ में नौ माह रहा,
अपनी ख़ुशी भूल तेरी ख़ुशी को जिया,
उसी के रूप को डँसते हो ,
अपनी मर्दानगी का रौब ,
कथित अबला पर झाड़ते हो,
अपनी सोच बदल के तो देखो,
ब्रह्माण्ड की रचना शक्ति का,
और खुद तेरे अस्तित्व का प्रमाण है बेटियां ...
$u$h!|
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