भाषा बनने को बेताब बोली




भारत में राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के बाद सबसे ज्यादा बोले जाने वाली बोलियों मे भोजपुरी है । समय समय पर इसको भाषा बनाने की मांग उठती रही है । इसके लिए विभिन्न आंदोलन भी हुये लेकिन ये आंदोलन तुच्छ राजनीति का शिकार हो गए । अब जरूरत है एक ऐसे आंदोलन की जो जनांदोलन बन जाये । भोजपुरी जनांदोलनों के जननायकों की बोली रही है जयप्रकाश नारायण से लेकर स्वतन्त्रता सेनानी मंगल पांडे ,वीर कुँवर सिंह ,अब्दुल हमीद तक । अगर राजनेताओं की बात की जाये तो पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम से लेकर पूर्व प्रधामन्त्री चंद्रशेखर सिंह का नाम ऐतिहासिक है । वर्तमान भारतीय राजनीति के केंद्र बिन्दु मे लालू प्रसाद यादव ,रामबिलास पासवान ,नितीश कुमार ,शरद यादव की भूमिका निर्णायक रहती है । लेकिन क्या कारण है कि भोजपुरी आज भी 8वीं अनुसूची मे शामिल नहीं हो पायी है ।
   भोजपुरी भाषी जनसंख्या 20 करोड़ से भी ज्यादा है । ये लोग भारत के विभिन्न हिस्सों मे अपना विशेष प्रभाव भी रखते हैं । सिंधी ,बोडो,मणिपुरी, और यहाँ तक कि नेपाली भाषा भी 8वीं अनुसूची मे हैं जबकि इन भाषाओं को बोलने वाले भोजपुरी भाषियों कि तुलना मे काफी कम लाखों मे ही हैं। आलोचक शामिल ना करने का तर्क देते हैं कि इससे हिन्दी को ही नुकसान होगा उनकी संख्या कम होगी । दूसरा यह कि आरबीआई द्वारा सभी भाषाओं मे नोटों पर मूल्य लिखना आसान ना होगा क्योंकि एक नोट पर जगह कम होती है । उनके इस तर्क मे दम नहीं है । मारिशस के हिन्दी विद्वान सोमदत्त बखोरी ने अपनी पुस्तक “एक मारिशस की हिन्दी यात्रा” मे लिखते हैं कि भोजपुरी केवल घर कि भाषा नहीं थी ,ये सारे गाँव कि भाषा थी । भोजपुरी के दम पर लोग हिन्दी समझ लेते थे और हिन्दी सीखना चाहते थे । वह सहायक सिद्ध होती थी । आज हम निःसंकोच कह सकते हैं कि इस देश मे हिन्दी फली फुली है तो भोजपुरी के प्रतापों से । दूसरे तर्क की बात की जाये तो अमेरिका मे शुरुआत मे 14 राज्य थे जो अब 50 हो चुके हैं । वहाँ की नोटों पर 14 अलग अलग तार और अन्य राज्यों को झंडे तथा छोटे छोटे अक्षरों मे नाम लिखे हैं । कुछ इस तरह का ही फार्मूला आरबीआई भी अपना सकता है ।
   भोजपुरी साहित्य का इतिहास लगभग 1000 साल पुराना है । इसकी लिपि देवनागरी है ।गुरु गोरखनाथ ने 1100 वर्ष मे गोरख बानी लिखा था । कबीर,रैदास ने मानववादी चिंतन और भिखारी ठाकुर ,राहुल सांस्कृत्यायन एवं अन्य ने दलित एवं स्त्री विमर्श पर चिंतन किया ।भोजपुरी मे औषधि,वास्तु,ज्योतिष,संगीत,नृत्य,कला,नाटक,योग,दर्शन,तंत्र-मंत्र,और व्याकरण आदि का हर तरह का साहित्य उपलब्ध है ।8 से 10 हज़ार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । 100 से ज्यादा पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं । यह भारत के अलावा अन्य 12 देशों मे बोली जाती है । मारिशस मे तो इसे संवैधानिक भाषा का दर्जा दे दिया गया है ।
     1969 से लेकर अब तक 18 बार विभिन्न विधेयक भोजपुरी को 8वीं अनुसूची मे शामिल करने के लिए संसद मे लाये जा चुके हैं ।लेकिन हर बार कोई ना कोई बहाना बनाकर इसे टाला जा रहा है । लोकसभा मे भोजपुरी भाषी सांसदों की संख्या 100 से ज्यादा है । जिसमे देखा जाये तो विशुद्ध रूप से भोजपुरी भाषी लोकसभा क्षेत्र बिहार,उत्तर प्रदेश एवं झारखंड का मिलाकर 90 हो जाता है । बिहार में 40, पूर्वाञ्चल 36, झारखंड 14,सीटें हैं ।अन्य राज्यों से भी भोजपुरी भाषी सांसद चुन कर आते हैं । पंजाब से सांसद सीमरजीत सिंह ने संसद मे कहा था कि-गुरु गोविंद सिंह जी की रचनाएँ भोजपुरी में हैं । हमारे ग्रन्थों के लिए इसका ज्ञान जरूरी है । इसलिए इसे पंजाब विश्वविद्यालय में एक पीठ की तरह पढ़ाया जाये ।       17 मई 2012 को पी॰ चिदम्बरम जो की आमतौर पर अङ्ग्रेज़ी और तमिल ही बोल पाते हैं उन्होने हम रऊआ सबके भावना के समझतानी बोलकर भोजपुरी की वकालत की थी । लेकिन यूपीए की सरकार 10 सालों मे इसे पूरा ना कर सकी । 16वीं लोकसभा मे भोजपुरी को लेकर उत्साह जरूर बना है । भोजपुरी गायक एवं अभिनेता और दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी बताते हैं कि संसद मे हम जब भी आपस मे मिलते हैं तो बात भोजपुरी में ही करते हैं । मुझसे तो गैर भोजपुरी भाषी सांसद भी का हो मनोज का हाल बा कहकर ही बातचीत की शुरुआत करते हैं । लालू की भाषण शैली और बोलने के अंदाज मे भोजपुरी टोन सबको कितना पसंद आती है बताने की आवश्यकता नहीं है ।
      अगर भोजपुरी बाज़ार की बात की जाये तो इसने सबका आकर्षण अपनी ओर खींचा है । इसके फिल्मों की बात की जाये तो भोजपुरी सिनेमा का बजट 500 करोड़ का है । जहां फिल्मों की कम लागत मे अच्छी ख़ासी कमाई हो जाती है । यही कारण है कि बॉलीवुड के स्टार भी यहाँ अपनी किस्मत आज़मा रहे हैं । अमिताभ बच्चन , मिथुन,अजय देवगन सरीखे सुपर स्टार भी फिल्मे कर रहे हैं । 2004 में मनोज तिवारी की आई फिल्म ससुरा बड़ा पईसा वाला मात्र 27 लाख मे बनी और 6 करोड़ की कमाई की । उसके बाद तो यहाँ फिल्मों की बाढ़ सी आ गयी,जो अब तक बदस्तूर जारी है । ये भोजपुरी बाज़ार का ही आकर्षण है कि अब यहाँ पर चैनल भी आने लगे हैं महुआ चैनल की सफलता एवं लोकप्रियता के बाद अनेक भोजपुरी चैनल आ गए हैं । जिसमे गंगा,हमार टीवी जैसे चैनल प्रमुख हैं । भोजपुरी को इंटरनेट फ्रेंडली बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है । बीएचयू के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान व भोजपुरी अध्ययन केंद्र मिलकर इंटरनेट फ्रेंडली बनाने मे जुटे हैं । इसका जिम्मा आईआईटी बीएचयू के निदेशक राजीव संगल कर रहे हैं । इसमे आईआईटी हैदराबाद की भी मदद ली जाएगी ।खबरिया पत्रकारों मे भी बड़े नाम हैं रवीश कुमार,पुण्य प्रसून,उर्मिलेश जैसे पत्रकार भी भोजपुरी भाषी हैं जो आज हिन्दी पत्रकारिता की रीढ़ बन चुके हैं ।

    इन नामों की उदासीनता का ही कारण है कि भोजपुरी को लेकर हुये आंदोलनों को मीडिया कवरेज नहीं मिल पाती है । 6 अगस्त 2015 को जंतर मंतर पर भोजपुरी भाषा मान्यता के बैनर तले आंदोलन हुआ लेकिन ये बड़ी खबर ना बन सका । बिहार के बड़े विश्वविद्यालयों के साथ साथ बीएचयू मे भी भोजपुरी की पढ़ाई की जाती है । इग्नू में भोजपुरी भाषा साहित्य एवं संस्कृति केंद्र भी है । भोजपुरी राष्ट्रीय भाषा ना होने कारण साहित्य पुरस्कार ,फिल्मों को राष्ट्रीय अवार्ड, भोजपुरी लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कारों की श्रेणी से बाहर रखा जाता है । जो की भोजपुरी के 20 करोड़ जनमानस के साथ अन्याय है । भोजपुरी की लोकप्रियता एवं मिठास का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि संगम नगरी मे मारिशस से आयी एक विदुषी ने कहा था कि भोजपुरी की मिठास की प्रगाढ़ता ही है कि जिसने मारिशस जैसे टापू को भी स्वर्ग बना दिया । 

Comments