कैसे
सहते हम दुनिया की रुसवाई को ,
कैसे
सुर सजाते हम अकेले ,
इन
सतरंगी सपनों की शहनाई को ,
अगर
तुम ना होते।
कैसे
मुकम्मल करते अपनी जिंदगी को ,
किससे
बांटते अपना ये दर्द ,
कैसे
लिखते अपनी गजल को,
अगर
तुम ना होते।
कब का छोड़ चुके होते हम इस शहर को ,
रास ना आती तेरे शहर की ये रिवायते ,
रास ना आती तेरे शहर की ये रिवायते ,
कैसे समझते इस जिंदगी के दस्तूर को ,
अगर तुम ना होते ।
कैसे ढूंढते इन अनदेखे रास्तों को ,
कैसे चलते इन पर हम बेपरवाह ,
भूल ही जाते इस भूलभुलैया की नगरी में ,
कैसे चलते इन पर हम बेपरवाह ,
भूल ही जाते इस भूलभुलैया की नगरी में ,
अगर तुम ना होते ।
किससे बांटते अपनी तन्हाई को ,
कैसे सह पाते बेदर्द जिंदगी की बेवफाई को ,
टूट कर बिखर ही जाते अकेले हम,
टूट कर बिखर ही जाते अकेले हम,
अगर तुम ना होते ।
इस दिल पर अख़्तियार था सिर्फ मेरा ,
ये ना टूट के बिखरता ना शिकायत होती ,
ना कोई आता , ना इसे प्यार होता ,
अगर तुम ना होते , अगर तुमा ना होते ...............॥
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