होलिका दहन भारत वर्ष मे क्यों मनाया जाता है ,जहां तक मुझे लगता है किसी को भी बताने की जरूरत नहीं है । एक आम सी कहानी
है एक राजा जिसका नाम हिरण्यकष्यप था उसका पुत्र प्रहलाद अपने पिता (हिरण्यकष्यप
खुद को भगवान मानता है और प्रजा से खुद की पुजा करने को कहता है) की सर्वसत्ता को
नहीं मानता है और वह भगवान भक्ति मे लीन रहता है जिससे हिरण्यकष्यप क्रोध मे आकर
अपने ही पुत्र को मारने का प्रण करता है । इस प्रकार वह अपनी बहन होलिका (जिसको
वरदान रहता है की वह आग मे नहीं जलेगी) को आदेश देता है की प्रहलाद को लेकर आग मे
बैठ जाए ,लेकिन आग मे प्रहलाद नहीं होलिका ही जल कर मर जाती
है। इस प्रकार होलिका दहन भारत मे एक छोटी होली के नाम की प्रथा बन चुकी है ।
होलिका दहन उस भारत वर्ष मे मनाया
जाता है जहां पर हम महिलाओं को देवी का दर्जा देते हैं,
उन्हे पूजते हैं । तो फिर होलिका की मृत्यु पर हम जश्न क्यों मनाते हैं ? क्या वह हमारी बहन नहीं हैं ? उसका दोष सिर्फ इतना
है कि वह अपने भाई कि आज्ञा का पालन करती है । अगर वह विरोध करती तो क्या हम आज
होलिका दहन मनाते ? ये समाज पितृसत्तात्मक है और समय समय पर
देश कि महिलाएं इसके खिलाफ आवाज उठाती रही हैं तो फिर होलिका कि मृत्यु पर हर साल
जश्न मनाया जाता है इसका विरोध क्यों नहीं होता ? क्या यह
महिला अत्याचार नहीं है जो सदियों से एक प्रथा बन चुकी है ।
अगर इस कहानी का दूसरा पक्ष अगर ये
हुआ होता कि उस आग मे होलिका के बदले प्रहलाद की मृत्यु हो जाती तो क्या हम
प्रहलाद दहन मनाते ? शायद नहीं । नहीं इसलिए की ,प्रहलाद तो पुत्र है ना । और पुत्रों की लालसा मे , कन्साॅर्टियम आन नेशनल कन्सेसस फार मेडिकल अर्बाशन इन इण्डिया के मुताबिक
हर साल यहां लगभग 110 लाख गर्भपात सम्पन्न होते हैं और लगभग 20
हजार महिलायें असुरक्षित गर्भपात या गर्भपात के दौरान उभरी जटिलताओं
के कारण मर जाती हैं। आंकड़े गवाह हैं की महिलाओं की आजादी और उनके लिए हमारी आदर्श
सोच सिर्फ कागजों और नारों तक ही सीमित है । जिसमे भागीदार हमारा वर्तमान तो है ही
साथ ही हमारी पौराणिक कहानियाँ भी ।
होलिका दहन के नाम पर भारत वर्ष
मे हर साल होली में लगभग 50 लाख होलिकाऍं जलती हैं, जिससे
लगभग एक करोड़ पेड़ भस्म हो जाते हैं। इसकी वजह से देश में प्रतिवर्ष लगभग 300
हेक्टेयर वन क्षेत्रफल का सफाया हो जाता है। होलिका जलने से प्रतिवर्ष देश में 25
हजार टन ग्रीन हाउस गैसों का इजाफा होता है। बुराई मिटाने के लिए छोटी होली पर होलिका दहन किया जाएगा। बुराई मिटेगी या नहीं यह बहस का विषय
है, पर इतना तय है कि हम नहीं चेते तो पर्यावरण ज़रूर मिट
जाएगा।
मेरा ये लेख किसी की आस्थाओं पर
चोट करने के लिए नहीं है। मैं तो सिर्फ सवाल कर रहा हूँ की क्या यही हमारा इतिहास
है। हम अपनी बहन बेटियों के खिलाफ अत्याचार पर प्रदर्शन करते हैं, कैंडील मार्च निकालते हैं । तो फिर होलिका की मृत्यु पर हर साल जश्न
क्यों मनाते हैं?

सही बात है ... परम्पराओं के नाम पर हमेशा हमारे देश में पर्यावरण का हनन हुआ है . अगर कोई खिलाफत करता है तो उसे ही रोका जाता है क्युकी ये आस्था पे सवाल होता है न...
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