यादों की कविता .....

जब उससे मिली थी, मेरी नजर ,

तो वो मुसकुराई थी ,

दोस्ती हुई इससे शुरू

और फिर मोहब्बत की भी घड़ी आई थी ,

उससे मिलना बाते करना,क्या खूब थे वो पल,

जन्नत कि हूर सी ऐसी मेरी आशनाई थी

मेरी जिंदगी तो थी अमावस की काली रात सी ,

वो पूर्णिमा का चाँद बनकर मेरी जिंदगी मे आई थी ,

प्यार क्या होता है बताकर ''सुशील'' 

वादो कि क्या उसने खूब झड़ी लगाई थी ,

जाने किस बात पर वो रूठी, पता नही ,

जब छोड़ जाने की उसने जिद लगाई थी ,

पर उसकी खातिर उस दिन,कि उसे दर्द ना हो बस ,

उसे देख मेरी आँखे,रोक कर अपना समंदर फिर भी मुस्कुराइ थी ॥ - सुशील

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