जब उससे मिली थी, मेरी नजर ,
तो वो मुसकुराई थी ,
दोस्ती हुई इससे शुरू ,
और फिर मोहब्बत की भी घड़ी आई थी ,
उससे मिलना बाते करना,क्या खूब थे वो पल,
जन्नत कि हूर सी ऐसी मेरी आशनाई थी,
मेरी जिंदगी तो थी अमावस की काली रात सी ,
वो पूर्णिमा का चाँद बनकर मेरी जिंदगी मे आई थी ,
प्यार क्या होता है बताकर ''सुशील''
वादो कि क्या उसने खूब झड़ी लगाई थी ,
जाने किस बात पर वो रूठी, पता नही ,
जब छोड़ जाने की उसने जिद लगाई थी ,
पर उसकी खातिर उस दिन,कि उसे दर्द ना हो बस ,
उसे देख मेरी आँखे,रोक कर अपना समंदर फिर भी मुस्कुराइ थी ॥ - सुशील
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