भारत निर्माण की कटु सच्चाई।



छोटू आज बहुत खुश था कि वह स्कूल जा रहा था,माँ उसे बड़े प्यार से तैयार कर रही थी । वह टिफिन बैग मे रखकर जैसे ही दरवाजे से बाहर निकला ही था कि,,उसे किसी ने हिलाया और आवाज दी- ''अबे उठ साले सुबह के 4 बज गए और तू सोया है, काम क्या तेरा बाप करेगा,चल उठ जल्दी झाड़ू लगा और बर्तन माँज ''।                                                                                                          स्कूल जाने का वह सपना देख रहा था,,उसके बारे मे पता किया तो मालूम हुआ कि माँ को कैंसर है और बाप जितना कमाता है सब पी जाता है ।छोटू की कमाई से ही घर चलता है 2 छोटी बहन भी है ,,ढाबे का मालिक जितना दे देता है छोटू रख लेता है । वह छोटू उस ढाबे से ही बाहर बच्चो को स्कूल जाते हुए देखता है ,और उन्हे देखकर कुछ सोचता है और फिर मुस्कुरा भी लेता है ।पहले ख्याल आया की इसे यहाँ से ले चलूँ,पर इसके बाद इसकी माँ की दवाओं और परिवार का खर्च कौन उठाएगा । उस मासूम को देखकर हृदय डोल जाता है और उसकी कहानी सुनकर रूह काँप सी जाती है । 13 साल कि उम्र मे इतना बड़ा बोझ उठाता रोज मालिक और ग्राहको कि गालिया सुनता उस मासूम को जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है ।
ये कहानी सरकारी नारों और विज्ञापनो जैसे -स्कूल चले हम ,, ।हो रहा भारत निर्माण । पढ़ेगा इंडिया ,बढ़ेगा इंडिया । मेक इन इंडिया , शाइनिंग इंडिया इत्यादि इत्यादि,की वास्तविकता पर प्रश्न चिन्ह है । ना जाने कितने ही छोटू आजादी के 68 सालो बाद भी अपने मूल अधिकारो से वंचित है ,, इन्हे एक नहीं हजारो कैलाश सत्यार्थी की जरूरत है । भारत के बचपन को सहेजने की जरूरत है । और हम आजादी के 68 साल बाद भी ये नहीं कर पाये हैं । इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है ॥ frown emoticon frown emoticon frown emoticon frown emoticon frown emoticon

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